भारतीय न्यायशास्त्र का डिजिटल उदय | डिजिटल साक्ष्य का नया युग

भारतीय न्यायशास्त्र का डिजिटल उदय | डिजिटल साक्ष्य का नया युग

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भारतीय न्यायशास्त्र का डिजिटल प्रभात

डिजिटल साक्ष्य का नया युग

भारत की न्याय व्यवस्था वर्तमान समय में एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। लगभग डेढ़ शताब्दी तक प्रभावी रहे भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 का स्थान अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) ने ले लिया है। यह परिवर्तन केवल किसी पुराने कानून के स्थान पर नया कानून लागू होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस न्यायिक व्यवस्था का प्रतीक है जो अब कागज़ी अभिलेखों की दुनिया से आगे बढ़कर डेटा, मेटाडाटा, डिजिटल रिकॉर्ड, एल्गोरिदम तथा वैज्ञानिक प्रमाणीकरण पर आधारित युग में प्रवेश कर चुकी है।

इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष “दस्तावेज़ (Document)” की अवधारणा का विस्तार है। अब केवल हस्ताक्षरित कागज़ ही दस्तावेज़ नहीं माना जाएगा, बल्कि सर्वर लॉग, व्हाट्सएप चैट, सीसीटीवी फुटेज, क्लाउड पर संग्रहीत दस्तावेज़, एन्क्रिप्टेड ई-मेल तथा ब्लॉकचेन रिकॉर्ड भी विधि की दृष्टि में उतने ही महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं, जितना कि कोई पारंपरिक लिखित दस्तावेज़।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के प्रमुख वैधानिक आधार

डिजिटल अथवा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता तीन महत्वपूर्ण प्रावधानों पर आधारित है।

धारा 61 – समान विधिक मान्यता का सिद्धांत (Principle of Parity)

यह धारा स्पष्ट करती है कि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और पारंपरिक दस्तावेज़ विधि की दृष्टि में समान हैं।

केवल इस आधार पर कि कोई साक्ष्य डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध है, न्यायालय उसे अस्वीकार नहीं कर सकता।

अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को वही विधिक वैधता, स्वीकार्यता तथा साक्ष्यात्मक महत्व प्राप्त है जो किसी भौतिक दस्तावेज़ को प्राप्त होता है।

धारा 62 – इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की विषयवस्तु का प्रमाण (Proof of Contents)

किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को केवल न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है।

उसकी विषयवस्तु का प्रमाण भी उसी प्रकार प्रस्तुत करना होगा, जैसा कि अधिनियम के आगामी प्रावधानों में निर्धारित किया गया है।

धारा 63 – इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की ग्राह्यता (Admissibility of Electronic Records)

  • कंप्यूटर आउटपुट
  • मोबाइल फोन का डेटा
  • डिजिटल संचार
  • इलेक्ट्रॉनिक संग्रहण उपकरण
  • इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से प्राप्त प्रतिलिपियाँ

ऐसे मामलों में प्रत्येक बार मूल हार्डवेयर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं होगा, यदि अधिनियम द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन किया गया हो।

 


प्राथमिक एवं द्वितीयक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य

Together, they form the architecture of democratic participation.भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक धारा 57 के अंतर्गत प्राथमिक साक्ष्य की विस्तृत परिभाषा है।

प्राथमिक साक्ष्य (Primary Evidence)

निम्नलिखित सामान्यतः प्राथमिक साक्ष्य माने जाएंगे

  • मूल मोबाइल फोन
  • मूल लैपटॉप
  • मूल हार्ड डिस्क
  • मूल हार्ड डिस्क
  • ऐसे क्लाउड रिकॉर्ड जो एक साथ अनेक संग्रहण प्रणालियों में निर्मित हुए हों

ऐसे साक्ष्य सामान्य परिस्थितियों में बिना किसी अतिरिक्त वैधानिक प्रमाण-पत्र के भी ग्राह्य हो सकते हैं।

द्वितीयक साक्ष्य (Secondary Evidence)

साक्ष्यद्वितीयक (Secondary Evidence)

  • प्रिंटआउट
  • स्क्रीनशॉट
  • पेन ड्राइव
  • फ्लैश ड्राइव
  • कॉपी की गई इलेक्ट्रॉनिक फाइलें
  • पीडीएफ प्रतिलिपियाँ

इनकी ग्राह्यता हेतु धारा 63 के अंतर्गत निर्धारित प्रमाणन प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होगा।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 द्वारा लाया गया महत्वपूर्ण परिवर्तन

पूर्ववर्ती विधि व्यवस्था में लंबे समय तक यह विवाद बना रहा कि क्या प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को स्वतः द्वितीयक साक्ष्य माना जाएगा।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 ने इस विवाद को काफी हद तक समाप्त कर दिया है।

यदि कोई इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड विधिसम्मत अभिरक्षा (Lawful Custody) से प्राप्त हुआ है अथवा वह एक साथ अनेक डिजिटल प्रणालियों में निर्मित हुआ है, तो परिस्थितियों के अनुसार उसे प्राथमिक साक्ष्य माना जा सकता है।

यह भारतीय साक्ष्य कानून में एक महत्वपूर्ण और आधुनिक सुधार है।

द्विस्तरीय प्रमाणन प्रणाली (Dual Certification Mechanism)

धारा 63 के अंतर्गत द्वितीयक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के प्रमाणीकरण हेतु दो स्तर की प्रमाणन व्यवस्था निर्धारित की गई है।

 

भाग–A : अभिरक्षक (Custodian) का प्रमाण-पत्र

  • जिसके पास संबंधित उपकरण का विधिसम्मत नियंत्रण हो, अथवा जो संबंधित कंप्यूटर प्रणाली के संचालन का उत्तरदायी हो।

इस प्रमाण-पत्र में यह प्रमाणित किया जाएगा कि-

  • उपकरण सामान्य रूप से कार्य कर रहा था, डेटा नियमित व्यावसायिक गतिविधियों के दौरान संग्रहीत किया गया, प्रस्तुत प्रतिलिपि मूल रिकॉर्ड का सही एवं यथार्थ प्रतिबिंब है।

यह प्रमाण-पत्र एक स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ द्वारा जारी किया जाएगा, जिसमें वह यह प्रमाणित करेगा कि-

  • डेटा किस प्रक्रिया से निकाला गया, उसकी अखंडता (Integrity) सुरक्षित है, फॉरेंसिक प्रक्रिया का पालन किया गया, रिकॉर्ड के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं हुई है।

 

 

हैश वैल्यू (Hash Value) : डिजिटल फिंगरप्रिंट

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था हैश वैल्यू है।

हैश वैल्यू किसी भी इलेक्ट्रॉनिक फाइल का डिजिटल फिंगरप्रिंट होती है।

  • एक अक्षर,
  • एक शब्द,
  • एक पिक्सेल,
  • वीडियो का एक सेकंड,
  • अथवा कोई अदृश्य डिजिटल कोड

भी परिवर्तित किया जाए, तो उसकी हैश वैल्यू पूर्णतः बदल जाती है।

इस प्रकार न्यायालय को तत्काल यह संकेत मिल जाता है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में परिवर्तन किया गया है।

अतः हैश वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रामाणिकता का एक वैज्ञानिक एवं गणितीय आधार प्रदान करती है।

Pune Bar Association बनाम Union of India वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता के संदर्भ में हैश वैल्यू के महत्व को स्वीकार किया।

न्यायालय ने माना कि हैश वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की अखंडता एवं प्रामाणिकता सुनिश्चित करने का एक विश्वसनीय तकनीकी माध्यम है।

न्यायिक मान्यता (Judicial Recognition)

Pune Bar Association बनाम Union of India वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता के संदर्भ में हैश वैल्यू के महत्व को स्वीकार किया।

न्यायालय ने माना कि हैश वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की अखंडता एवं प्रामाणिकता सुनिश्चित करने का एक विश्वसनीय तकनीकी माध्यम है।

  • एक अक्षर,
  • एक शब्द,
  • एक पिक्सेल,
  • वीडियो का एक सेकंड,
  • अथवा कोई अदृश्य डिजिटल कोड

भी परिवर्तित किया जाए, तो उसकी हैश वैल्यू पूर्णतः बदल जाती है।

इस प्रकार न्यायालय को तत्काल यह संकेत मिल जाता है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में परिवर्तन किया गया है।

अतः हैश वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रामाणिकता का एक वैज्ञानिक एवं गणितीय आधार प्रदान करती है।

Pune Bar Association बनाम Union of India वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता के संदर्भ में हैश वैल्यू के महत्व को स्वीकार किया।

न्यायालय ने माना कि हैश वैल्यू इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की अखंडता एवं प्रामाणिकता सुनिश्चित करने का एक विश्वसनीय तकनीकी माध्यम है।

 


डिजिटल युग की चुनौतियाँ

यद्यपि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 ने डिजिटल साक्ष्य के लिए एक सुदृढ़ विधिक ढाँचा प्रदान किया है, तथापि अनेक तकनीकी चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं।

डीपफेक एवं जनरेटिव एआई

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के माध्यम से आज ऐसे वीडियो, चित्र और आवाज़ें तैयार की जा सकती हैं, जो वास्तविक प्रतीत होती हैं।

ऐसी स्थिति में किसी डिजिटल साक्ष्य की वास्तविकता का परीक्षण न्यायालयों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।

चेन ऑफ कस्टडी (Chain of Custody)

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जब्त किए जाने से लेकर न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने तक सुरक्षित एवं अपरिवर्तित रहना चाहिए।

इसके लिए वैज्ञानिक फॉरेंसिक प्रक्रियाओं तथा सुदृढ़ संस्थागत व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है

एल्गोरिद्मिक उत्तरदायित्व (Algorithmic Accountability)

एआई आधारित प्रणालियों तथा ब्लैक-बॉक्स एल्गोरिद्म के बढ़ते उपयोग के कारण कई नए विधिक प्रश्न उत्पन्न हो रहे हैं—

  • डेटा का वास्तविक स्वामी कौन है?
  • डेटा किसने उत्पन्न किया?
  • स्वचालित निर्णयों के लिए उत्तरदायी कौन होगा?
  • न्यायालय किसी अपारदर्शी तकनीकी प्रणाली की सत्यता का परीक्षण किस प्रकार करेगा?
  • अथवा कोई अदृश्य डिजिटल कोड

निष्कर्ष

इस अधिनियम ने इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को पारंपरिक दस्तावेज़ों के समान विधिक मान्यता प्रदान करते हुए, उनकी ग्राह्यता के लिए एक सुव्यवस्थित प्रमाणन व्यवस्था विकसित की है। साथ ही, हैश वैल्यू जैसे वैज्ञानिक एवं तकनीकी सुरक्षा उपायों को अनिवार्य बनाकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि तकनीकी प्रगति और निष्पक्ष न्याय—दोनों के मध्य उचित संतुलन बना रहे।

अब न्यायालयों में सत्य केवल कागज़ पर नहीं लिखा जाएगा, बल्कि वह मेटाडाटा में संरक्षित होगा, क्रिप्टोग्राफिक फिंगरप्रिंट द्वारा सत्यापित होगा और डिजिटल फॉरेंसिक विज्ञान के माध्यम से संरक्षित भी रहेगा।

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